गीता । Gita – भगवद्गीता । Bhagvadgita – अध्याय ३: श्लोक २२-२३

Chapter 3: Verse 22-23

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥३-२२॥

In all the three worlds, there is no action (duty) ordained for me; nor there is any thing which remains unattained for Me (that I do not have).Still, O Partha, I am ever engaged in action.

Lesson: Even the best of the role models perform action.

हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूं। ॥२२॥

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥३-२३॥

 
If I do not engage in action vigilantly, O Partha, in all probability, others would start following My path (follow My behaviour of not doing work).

 

क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूं तो बडी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। ॥२३॥

गीता । Gita – भगवद्गीता । Bhagvadgita – श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय ३: श्लोक २२-२३

6 Comments

  1. हरिराम August 14, 2007 Reply
  2. RC Mishra August 15, 2007 Reply
  3. Prem September 29, 2007 Reply
  4. Prem September 29, 2007 Reply
  5. RC Mishra September 29, 2007 Reply
  6. Prem September 29, 2007 Reply

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