Chem-Bio & Life!

हिन्दी ब्लॉग – by RC Mishra

Chapter 2: Verse 50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥२-५०॥

A person with evenness of mind is not attached to the fruits of good or bad deeds. He casts off the virtue and sin in this world alone. Therefore, devote yourself to (karma) yoga (with evenness of mind/equanimity). Performing duty with efficiency is yoga.
Lesson: By performing duty with evenness of mind a person accomplishes his job with greater efficiency and skill.

समबुध्दियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है। ॥५०॥

 

गीता । Gita – भगवद्गीता । Bhagvadgita – श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ५०

2 thoughts on “गीता । Gita – भगवद्गीता । Bhagvadgita अध्याय २: श्लोक ५०

  1. ज्ञान प्रद शिक्षा! आपके ब्लोग पर बहुत अच्छा लगता है पढ़ना…

    सुनीता(शानू)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.